Saturday, September 24, 2011

पाटेबाजी से किसका भला

डेढ़ साल पहले जब मैं बीकानेर आने की तैयारी कर रहा था तो मुझे कुछ मित्रों ने यहां की खासियतों में पाटों के बारे में जमकर कसीदे पढ़े थे। तर्क दिया गया कि ये पाटे इस मरु नगरी की लोक संस्‍कृति, साहित्‍य सृजन और साम्‍प्रदायिक सौहार्द्र के वाहक हैं। ऐसे में इन्‍हें लेकर मन में जिज्ञासा स्‍वाभाविक थी। बीकानेर में आते ही इन पाटों से रूबरू हुआ। पाटा यानी लकड़ी का बड़ा तख्‍त। भीतरी शहर में हर चौक या मोहल्‍ले का अपना पाटा है। खास तौर पर पुष्‍करणा और ओसवाल बिरादरी के लगभग सभी चौकों में ये पाटे हैं, जो देर रात तक गुलजार रहते हैं। चर्चा के साथ ही कुछ लोग तो घर जाने के बजाय इन पर सो भी जाते हैं। इन पाटों पर हर उम्र का व्‍यक्‍ित बैठता है।

किसी जमाने में ये पाटे चौपाल की भूमिका निभाते थे। खुशी का मौका हो या गमी का माहौल, इन पाटों का इस्‍तेमाल होता था। जिस चौक का पाटा है, उसके आस-पास के लोगों के सभी विवाद वहां निपटाए जाते हैं। पाटों पर बैठे मोहल्‍ले के मुखियाओं का फरमान सभी को मानना पड़ता था। इनमें ना कोई जात-पात और ना ही कोई छुआ-छूत। सभी को समाजवादी नजर से देखा जाता था। समय बदला, पाटे जहां के तहां रहे, लोग भी आते-जाते रहे, लेकिन भूमिका बदलती गई। ये पाटे मोहल्‍ले के बुजुर्गों का आराम स्‍थली और कुछ ठाले लोगों का टाइम पास साधन बनकर रह गए हैं। कॅरियर की दौड़ में शामिल युवा एक तरह से इन पाटों से बहुत दूर चला गया है,क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि पाटेबाजी उनका भविष्‍य संवार नहीं सकती है।

बीकानेर में पाटा संस्‍कृति पनपने के पीछे यहां की बसावट भी प्रमुख वजह रही है। शहर में छोटी-छोटी गलियां,  जीरो सेटबैक पर बनाए मकान और इनमें आंधियों से बचने के लिए छोटे-छोटे झरोखे। ऐसे में हर गली में लोहे या लकड़ी के तख्‍त बिछा दिए गए, जिन पर बैठ कर लोग खाली समय में सामूहिक चर्चा कर सकें। धीरे-धीरे समाज में इन पाटों की उपयोगिता बढ़ती गई और इन पर मोहल्‍ले के बारे में सकारात्‍मक फैसले लिए जाते थे। रातभर पाटे आबाद रहने के कारण मोहल्‍ले की चौकसी भी होती थी। लेकिन, बहुत मायने में अब ऐसी स्थिति नहीं रही है। कुछ महीने पहले डकैत रांगड़ी चौक में करोड़ों रुपए का डाका डालकर एक जौहरी की हत्‍या कर गए, लेकिन पाटों पर जमे लोगों को भनक तक नहीं लगी।

बीकानेर जैसी पाटा संस्‍कृति की झलक राजस्‍थान की सूर्यनगरी जोधपुर और मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी दिखाई दे सकती है, लेकिन वहां अब इस मरुनगरी जितनी चहल-पहल नजर नहीं आएगी। कारण यह भी सकता है कि राजस्‍थान का चौथा बड़ा शहर होने के बावजूद बीकानेर का व्‍यक्‍ित  भाग-दौड़ की जिंदगी से बहुत दूर है। जोधपुर और भोपाल विकास की दौड़ में बीकानेर से काफी आगे निकल चुके हैं। लेकिन, बीकानेर अपनी जिंदगी को अपने अंदाज में जी रहा है।

चारदीवारी के भीतर के लोगों में अपने शहर के प्रति इतनी दीवानगी है कि वह बीकानेर में रहने के लिए नौकरी के बड़े से बड़े ऑफर छोड़ने को तैयार है। जितना मिला, उतने में ही संतुष्‍ट। टाइम पास के लिए पाटे से बढि़या कोई साधन नहीं। पाटे पर शहर की हर खबर मिलेगी। गर्मी में पाटे रात भर आबाद रहते हैं। जिसे घर नहीं जाना, वह बतियाते हुए पाटे पर ही सो जाता है। सर्दी में रात दो बजे तक अलाव जलाते हुए घाये-घूती यानी इधर-उधर की बातों में तल्‍लीन रहते हैं। भट्ठडों के चौक का पाटा तो बारहमास रातभर जागता रहता है।

स्‍वाभाविक है कि आप देर रात या रातभर जागेंगे तो दिन में देर तक सोएंगे। यदि किसी कारण से सो नहीं पाए तो आलस्‍य छाया रहेगा। यही आलस्‍य आज इस शहर के लिए नुकसानदायक बनकर उभर रहा है। सरकारी कर्मचारी समय पर ऑफिस नहीं पहुंचते। पहुंच भी गए तो ऑफिस में कुर्सी पर दिनभर उंघते रहेंगे। यहां के ज्‍यादातर सरकारी कार्यालयों में ऐसे लोगों की भरमार है, जो पाटेबाजी में माहिर हैं। रात में मोहल्‍ले का पाटा तो दिन में ऑफिस की कुर्सी टाइम पास का माध्‍यम दिखती है। स्थिति यह है कि ऑफिस में काम का कोई माहौल ही नजर नहीं आता है। जो सरकारी नौकरी में नहीं है, उनमें भी काम को लेकर कोई जोश नहीं दिखाई देता है। कुछ लोग तो एक सप्‍ताह कमा कर महीने भर घर में बैठना पसंद करते हैं।

भले ही पाटा संस्‍कृति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हो, लेकिन मुझे आज के समय में इनकी कोई सार्थकता नजर नहीं आती है। देर रात तक पाटों पर जहां भंगेडियों की फौज बैठी रहती है, वही इनके
आस-पास जुआ का खेल चलता रहा है। दोनों को एक-दूसरे से कोई सरोकार नहीं। एक तरफ पाटेबाजी तो दूसरी ओर जुआ का खेल। जुए के बढ़ते रूझान को देखकर लगता है कि यह शहर अब जुआ संस्‍कृति का हिस्‍सा बनता जा रहा है। सार्थक उपयोगिता नहीं होने के कारण कुछ पाटे तो चुनिन्‍दा लोगों की जागीर बनते जा रहे हैं, जिन पर उनकी मर्जी के बगैर कोई बैठ नहीं सकता है। इन पाटों की पुरानी स्थिति को बहाल करने के लिए इस शहर में कम लोग ही चिन्तित दिखते हैं।







Thursday, September 22, 2011

श्राद्ध पर डिनर


बीकानेर में मुझे डेढ़ साल हो रहा है। श्राद्ध का यह पर्व दूसरा है। जैसे-जैसे मैं इस शहर के गली-मोहल्‍लों से से परिचित हो रहा हूं, वैसे ही मुझे यहां के तीज-त्‍योहार और रीति-रिवाज समझ में आने लगे हैं। मुझे इस श्राद्ध में जो सबसे अजीब लगा, वह यहां पितरों को तृप्‍त करने के लिए डिनर का आयोजन। देश के उत्‍तरी और मध्‍य इलाकों में श्राद्ध पर पितरों को तृप्‍त करने की परम्‍परा है। दिन में ब्राह्मण को भोज और कोओं को कोर खिलाने की रस्‍म निभाई जाती है। लेकिन, बीकानेर में खान-पान के शौकीनों ने इससे भी बढ़कर डिनर के आयोजन की परम्‍परा निकाल ली है। 

मेरी नजर में यह परम्‍परा लोगों के लिए पितरों से ज्‍यादा खुद को तृप्‍त का माध्‍यम दिखाई देती है। बीकानेर के भीतरी शहर में श्राद्ध को किसी उत्‍सव की तरह लिया जाता है। इसमें परलोक सिधार गए चेहते परिजन कितने तृप्‍त होते हैं, यह तो वो ही जानें, लेकिन श्राद्ध पर खाने-पीने को जो दौर चलता है, वह आज के दौर के किसी जन्‍मदिन या शादी की सालगिरह के जश्‍न से कम नहीं होता है। कम से दो-तीन सौ रिश्‍तेदारों की फौज दिनभर के कामकाज को निपटा कर शाम को एकत्रित होती है और फिर स्‍वाद के बीच चलता है श्राद्ध का डिनर।

यह किसी एक घर की दास्‍तां नहीं है, बल्कि भीतरी शहर में हर घर में ऐसा नजारा सामान्‍य है। यहां इसे परम्‍परा को कोई बुरा नहीं मानता। सब अपने पितरों को तृप्‍त करने के नाम पर ज्‍यादा से ज्‍यादा अच्‍छा आयोजन करना चाहते हैं। श्राद्ध के दिन की शुरूआत ब्राह्मण और कोओं को उनके हिस्‍से का खाने के साथ होती है। इसके बाद शाम को घर के सभी परिजन श्राद्ध के डिनर में तल्‍लीनता से जुट जाते हैं। मेरे जैसे व्‍यक्‍ित को यहां हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है,क्‍योंकि मैं न तो श्राद्ध और न ही किसी की मौत पर ऐसे भव्‍य आयोजन को पसंद करता हूं।

शायद ही कोई ऐसा दिन होगा, जब ऑफिस में मुझसे कोई न कोई साथी श्राद्ध पर छुट्टी मांगने न आया हो। एक ही जवाब होता है कि शाम को श्राद्ध है, रिश्‍तेदार एकत्रित होंगे, छुट्टी चाहिए। चूंकि यह सामने वाले की आस्‍था का मामला है, इसलिए मेरे पास अवकाश स्‍वीकृत करने के सिवाय कोई रास्‍ता नहीं है। छुट्टी नहीं दूंगा तो मेरे ऊपर कर्मचारी विरोधी होने का आरोप लगाया जा सकता है। हमारे यहां ऐसे भी कर्मचारी हैं, जो श्राद्ध पर अवकाश नहीं देने पर नौकरी को लात मारने को तैयार बैठे हैं।

इस मरुनगरी में श्राद्ध पर बगैर किसी लाभ-हानि के मिठाईयों की दुकानें भी सजी हैं। इन दुकानों पर बाजार से कुछ कम दरों पर मिठाई उपलब्‍ध हैं, जहां से मिठाई खरीदकर आप अपने रिश्‍तेदारों को खिलाकर पितरों को तृप्‍त कर सकते हैं। ऐसी दुकानों पर कचौरी-समोसे से लेकर काजू और बादाम कतली तक खरीद सकते हैं। मेरी नजर में ऐसी ज्‍यादातर दुकानें बिना लाभ-हानि के बजाय बाजार से अपेक्षाकृत कम फायदे के फार्मूले पर चलती हैं। खैर यह कोई बहस का विषय नहीं है, लेकिन श्राद्ध को मनाने के लिए बाजार आपकी पूरी मदद करता है।

मैं यहां के ऐसे बहुत परिवारों को जानने लगा हूं, जो श्राद्ध का डिनर भी कर्ज लेकर करते हैं। बीकानेर में श्राद्ध का सामान्‍य आयोजन बीस से पच्‍चीस हजार रुपए के आसपास बैठता है। यहां के सामान्‍य परिवारों के लिए इतनी राशि जुटाना बगैर कर्ज के संभव नहीं है। मृत्‍युभोज का यह एक छोटा रूप है। अगर आप यहां के मृत्‍युभोज का नजारा देखें तो उसका बजट श्राद्ध से बहुत गुणा ज्‍यादा दिखाई देगा। परिवार में मौत के दूसरे दिन से ही घर में पकवानों की दावत उड़ने लगती हैं। बारह दिन के दावत की दिनवार सूची तैयार की जाती है। इसमें मरने वाले व्‍यक्‍ित को क्‍या-क्‍या पसंद था, वो सब माल इन दावतों में तैयार होगा। एक दिन काजू कतली है तो दूसरे दिन जलेबी का दौर। मीठा खाते-खाते उकता गए तो नमकीन के रूप में गोल गप्‍पे या दहीबड़ा का स्‍वाद भी चखने को मिलेगा। हर दिन 200 से 500 लोगों का भोजन होगा। पगड़ी रस्‍म के दिन यह भोजन विराट रूप ले लेता है।

आपके पास पैसा है तो बेहिचक सभी न्‍यातों को न्‍यौता दे सकते हैं। यदि पैसा नहीं है तो आपको कर्ज लेना ही पड़ेगा। कर्ज से किसी भी आमंत्रित रिश्‍तेदार या जानकार को कोई सरोकार नहीं है। सब यही कहकर हौसला अफजाई करेंगे कि मरने वाले की कुछ इच्‍छाएं थी, जो परिवार को तो पूरी करनी है। आप नहीं जीमण नहीं करेंगे तो हो सकता है कि मरने वाले की आत्‍मा भूख से तड़फती रहे और उसे शांति नहीं मिले। जिंदा रहते हुए वो हमारे लिए बोझ था, पर आज उसके नाम पर खाने-पीने के लिए सब एक हैं।